ये कैसा रिश्ता है... तुम्हारा और मेरा? नहीं समझ पाती मैं। कभी मीठा, कभी कट्ठा, कभी नफरत का तो कभी बेशुमार प्यार भरा। कभी सूरज सा चमकता है, तो कभी काली घटा सा बरसता है। कभी ठंडी हवा के झोंके सा सुकून देता है, तो कभी सर्द रातों सा बेचैन कर जाता है।
कहने को तो अब हम सिर्फ नफरत की एक बारीक डोर से बंधे हैं - जो बेशक हमें प्यार करने की इज़ाजत तो नहीं देती, मगर हमें एक-दूसरे से अलग होने का फरमान भी नहीं सुनाती।
तुम्हे याद है… हमारी अनगिनत आख़िरी मुलाकातों में से वो आख़िरी मुलाकात जब मैने एक ही साँस में तुमसे कहा था कि मुझे नफरत है – तुमसे, तुम्हारे नाम से, तुम्हारे वजूद से, यहाँ तक कि तुम्हारे सायें से भी। उस वक़्त मुझे पहली बार एहसास हुआ कि कुछ तो है हमारे दरमियाँ जो सबसे जुदा है, सबसे अलग। शायद इसलिये ही मेरा जहन, अगले ही पल ये गवाही देने से इंकार कर गया था के मुझे नफरत है... तुमसे। ना जाने क्या है ऐसा जो सिर्फ मुझे तुमसे मोहब्बत करने को मजबूर करता है। क्यूँ इतना अलग है...तुम्हारा और मेरा रिश्ता?
हाँ... इस बात से वाकिफ हूँ के अब ना मुलाकात होगी, ना ही कोई बात होगी। अब ना तुम हक़ से मेरा हाथ थामोगे, ना ही फिर जज़्बातों की बरसात होगी। वैसे यही सब तो चाहती थी मैं। तुमसे दूर जाना... बहुत दूर। लेकिन अब सब गलत लग रहा है। कुछ सही नहीं है। तुम ना जाने मेरे दिल के किस कोने में अपना डेरा डाल कर बैठ गए हो। अब तुम्हें वहाँ से हटाना मुश्किल हो रहा है... बहुत मुश्किल।
जाने ये कैसा रिश्ता है... कहने को नफरत है, मुझे तुमसे और तुम्हें मुझसे, फिर जाने क्यूँ ये प्यार कम क्यूँ नहीं होता?
जाने ये कैसा रिश्ता है... कहने को नफरत है, मुझे तुमसे और तुम्हें मुझसे, फिर जाने क्यूँ ये प्यार कम क्यूँ नहीं होता?
क्यूँ सब रिश्तों से जुदा है... तुम्हारा और मेरा रिश्ता?

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